Hello and welcome to Media Literacy Initiative. If you see this page, you were redirected here after clicking on a link that you were shown after watching an ad online. On this page, you can learn more about the purpose of the ad you watched and the scientific research behind it.
Media Literacy Education is a project by Mythos Labs and research partner University of Cambridge, supported by the Alfred Landecker Foundation, Google Jigsaw, and Omidyar Network India. We are trying to find out if it’s possible to improve people’s ability to spot persuasion techniques commonly used online. This idea is grounded in inoculation theory, a framework from social psychology which posits that it’s possible to build psychological resistance against future unwanted persuasion attempts through “prebunking” (or pre-emptive debunking). To learn more about how this works, please click this link.
As part of this project, we’ve created a series of educational prebunking videos, each explaining a specific persuasion technique or logical fallacy commonly encountered online, such as using emotionally-charged language, spoofing, or perfect solution fallacy. Please click this link to watch the videos.
To test whether these videos actually improve people’s ability to spot potentially negative persuasive content, we ran a series of randomised controlled studies in a laboratory setting. The results were very positive: compared to a control group, study participants who watched an educational prebunking video became significantly better at discerning persuasive social media content from the non-persuasive social media content, were more confident in their ability to assess the quality of information on social media, improved in their ability to identify trustworthy content, and indicated being less willing to share negatively persuasive content with others. The results of this study were published in Science Advances.
For this specific study, we were interested in finding out if the videos are effective at improving people’s ability to spot manipulative social media content if you run them as an advertisement online. To do so, we bought ads to show these five videos to a random sample of Indian internet users online who met the following criteria: 1) 18 years or older; 2) Indian resident; 3) Hindi/Marathi/Telegu-speaking. Within this sample, people were randomly shown one of the prebunking videos as an ad. A random subset of people who were shown either video were subsequently shown a single survey question, where they were asked to identify which persuasion technique is being used in a fictional social media post. In total, we created 6 such social media posts, which we stripped of all source and other identifying information. Half of these posts (3) were phrased to be persuasive, whereas the other half were each persuasive post’s neutral (non-persuasive) pair. You can see an example of a persuasive post and its neutral pair below.
As you can see, both posts are related to cricket. However, the persuasive post (on top) contains words such as “cricket superstar” which is a type of identity-mimicking phrasing that research shows can increase the viral potential of online content. The post on the right is worded to be much more neutral and does not use language that mimics anyone’s identity. In total, we created 3 such manipulative-neutral pairs.
In this study, we are testing the hypothesis that participants who watched the prebunking video as an ad are significantly better than a control group (a random group of users that meets the recruitment criteria and saw a different video) at correctly identifying the use of a particular persuasion technique in social media content. We will update this page once we know more about whether these hypotheses were confirmed.
If you answered a survey question after watching one of the above videos, your response will be recorded and used in our study. To ensure your privacy, we do not record any usernames or other personally identifying information. We are only interested in study participants’ responses to the survey questions as part of our scientific research and therefore do not collect any demographic or other data. Because we do not record any identifying information (and therefore can’t match responses to any individuals), we are unfortunately unable to remove any responses from our dataset upon request after they have been recorded. This study was reviewed by the Cambridge University Psychology Research Ethics Committee. Should you have any questions or concerns about this study, please contact the coordinator of this study, Dr. Jon Roozenbeek (jjr51@cam.ac.uk).
Hello और Media Literacy Initiative में आपका स्वागत है। यदि आप इस पेज को देख रहे हैं, तो आपको ऑनलाइन एड में प्रदर्शित लिंक पर क्लिक के बाद इस पेज पर लाया गया है । इस पेज पर, आप उस एड के मकसद और और उसके पीछे क्या वैज्ञानिक कारण है यह जानकारी हासिल करेंगे .
Media Literacy Education प्रोजेक्ट Mythos Labs और research partner कैंब्रिज यूनिवर्सिटी द्वारा चलाया जा रहा है, जिसे Alfred Landecker फाउंडेशन, Google Jigsaw, और Omidyar Network India का समर्थन प्राप्त है। हम इस प्रोजेक्ट के जरिये यह जानने की कोशिश कर रहे हैं की क्या वाकई ऑनलाइन इस्तेमाल होने वाली प्रभावशाली तकनीकों से लोगों को मदद मिल रही है। यह विचार Social Psycology के एक ढांचे में आधारित है, जिसे inoculation यानी सूक्ष्मपतन सिद्धांत कहा जाता है, जो कहता है कि भविष्य के अनचाहे तकनीकी प्रयासों को रोकने के लिए मनोवैज्ञानिक संगठन द्वारा किये जाने वाले पूर्वबंधन” (या पूर्वानुमानित खण्डन) से प्रयास और इनके प्रभावों को रोका जा सकता है। इसके बारे में और अधिक जानने के लिए, कृपया इस लिंक पर क्लिक करें:
इस project के के तहत हमने एक शिक्षात्मक प्रीबंकिंग (educational prebunking) वीडियो सीरीज बनाई है, जिनमें हर एक वीडियो ऑनलाइन आमतौर पर मिलने वाली किसी न किसी तकनीक या इनफार्मेशन के नाम पर ऑनलाइन फैलाये जा रहे भ्रम की व्याख्या की है, जैसे Emotional language का उपयोग करना, स्पूफिंग, या पूरी समस्या के समाधान के नाम पर अन्धविश्वास को बढ़ावा देना . कृपया वीडियो देखने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।
लोगों में इस तरह की वीडियो को पहचानने की क्षमता को जांचने के लिए हमने कुछ एक्सपेरिमेंट्स किए। results बहुत positive रहे: कण्ट्रोल ग्रुप की तुलना में जिन छात्रों ने इस प्रोजेक्ट में हिस्सा लिया था और प्रबंकिंग वीडियो देखे उनमें आत्मविश्वास के साथ कंटेंट को पॉजिटिव और नेगेटिव के तौर पर परखने की क्षमता काफी ज्यादा थी, और इस प्रोजेक्ट ने उन्हें यह जानने और समझने में सक्षम बना दिया कि वह किस प्रकार के कंटेंट पर भरोसा कर सकते हैं साथ ही उनमे नेगेटिव कंटेंट को शेयर करने की जिज्ञासा भी कम आंकी गयी। इस study के परिणाम ‘साइंस एडवांस’ में प्रकाशित हुए।
इस अध्यन के लिए, हम यह जानना चाहते थे कि क्या वाकई इन वीडियोस से लोगों को manipulative social media कंटेंट पहचानने में मदद मिल रही है, क्या अगर इन वीडियोस को advertisement के माध्यम से दिखाया जाए तो क्या ये तब भी कारगर होंगे? ऐसा करने के लिए हमने रैंडम इंटरनेट users को यह पांच वीडियोस दिखाने के लिए ad slots ख़रीदे इन एडस को दिखाने के मापदंड थे 1) 18 वर्ष या उससे अधिक उम्र; 2) भारतीय नागरिकता 3) हिंदी /मराठी/तेलुगू बोलने वाले। इस sample के भीतर, लोगों को randomely एक प्रीबंकिंग वीडियो दिखाया गया। जिन लोगों के सामने इनमें से किसी भी एक वीडियो का प्रदर्शन किया गया था उनके सामने एक सर्वे रखा गया जिसमें उन्हें प्रश्न का उत्तर देना था, जिसमें उनसे पूछा गया कि एक fictional social media post में कौनसी प्रभावशाली टेक्निक का प्रयोग किया जा रहा है। कुल मिलाकर, हमने 6 ऐसे सामाजिक मीडिया पोस्ट्स बनाये, जिनमें हमने उनके source या पहचान उजागर करने वाली छुपा दिया। इन पोस्ट्स में से आधी (3) में प्रभावित करने वाले शब्दों का प्रयोग किया गया, जबकि आधी 3 पोस्ट में ऐसे किसी भी शब्द का प्रयोग नहीं किया गया. आप नीचे उदाहरण के माध्यम से इसे समझ सकते हैं.
जैसा कि आप देख सकते हैं, दोनों पोस्ट क्रिकेट से संबंधित हैं। हालांकि, persuasive post (ऊपर वाला) में “क्रिकेट सुपरस्टार” जैसे शब्द हैं जो आईडेंटिटी की नकल करने वाले वाक्यांश हैं और शोध के अनुसार ऑनलाइन सामग्री की वायरल होने की संभावना को बढ़ा सकते हैं। दाएं ओर की पोस्ट में किसी प्रभावशाली व्यक्ति की पहचान का उपयोग न कर उचित भाषा शैली का प्रयोग किया गया है, दाएं ओर वाली पोस्ट में बहुत अधिक न्यूट्रल ढंग से शब्दों का उपयोग किया गया है। कुल मिलाकर हमने 3 ऐसे प्रभावित व न्यूट्रल जोड़ी बनाई।”
इस अध्ययन में, हम यह हाइपोथेसिस परीक्षण कर रहे हैं कि प्रीबंकिंग वीडियोस को ad के रूप में देखने वाले लोग control group की तुलना में manipulative social media content में प्रभावशाली तकनीक (persuasion technique) को पहचाने में ज्यादा सक्षम है. हम इस पृष्ठ को अपडेट करेंगे जब हमें यह पता चल जाएगा कि क्या ये हाइपोथेसिस साबित हुई हैं या नहीं।
यदि आप से सम्बंधित वीडियो में सर्वेक्षण प्रश्न का उत्तर दिया जाता है, तो आपका प्रतिक्रिया रिकॉर्ड किया जाएगा और हमारे अध्ययन में प्रयोग किया जाएगा। आपकी गोपनीयता सुनिश्चित करने के लिए, हम किसी यूजरनेम या अन्य व्यक्तिगत पहचान सूचना को रिकॉर्ड नहीं करते हैं। हम किसी केवल अध्ययन में survey questions के जवाबों को जानना चाहते हैं , जो हमारे वैज्ञानिक शोध का हिस्सा हैं, और इसलिए हम कोई जनसांख्यिकी या अन्य डेटा नहीं एकत्र करते हैं। हम किसी पहचान की सूचना को रिकॉर्ड नहीं करते हैं (और इसलिए किसी व्यक्ति की प्रतिक्रियाओं को किसी भी प्रकार से साझा नहीं कर सकते), हमें खेद है कि हम किसी भी प्रतिक्रिया को एक बार रिकॉर्ड हो जाने के बाद अपने डेटाबेस से हटा नहीं सकते । यह अध्ययन कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी मनोविज्ञान शोध नैतिक समिति द्वारा किया गया था। इस अध्ययन के बारे में कोई सवाल या चिंता हो तो, कृपया इस study के समन्वयक से संपर्क करें।
Dr. Jon Roozenbeek (jjr51@cam.ac.uk).
नमस्कार आणि मीडिया साक्षरता उपक्रमात आपले स्वागत आहे. आपण ह्या पेजवर आल्यावर, ऑनलाइन जाहिरात पाहिल्यानंतर तुम्हाला दाखवलेल्या लिंकवर क्लिक केल्यानंतर तुम्हाला येथे पुनर्निर्देशित केले गेले होते. या पेजवर, आपण पहात असलेल्या जाहिरातीचा उद्देश आणि त्यामागील वैज्ञानिक संशोधन याबद्दल अधिक जाणून घेऊ शकता.
मीडिया साक्षरता शिक्षण हा Mythos Labs आणि संशोधन भागीदार युनिव्हर्सिटी ऑफ केंब्रिजचा एक प्रकल्प आहे, जे अल्फ्रेड लँडेकर फाउंडेशन (Alfred Landecker Foundation), Google Jigsaw आणि Omidyar Network India द्वारे समर्थित आहे. सामान्यतः ऑनलाइन वापरल्या जाणार्या लोकांचे मन वळवण्याचे/पटवून देण्याचे तंत्र शोधण्याची क्षमता सुधारणे शक्य आहे का हे शोधण्याचा आम्ही प्रयत्न करत आहोत. ही कल्पना इनोक्युलेशन सिद्धांतावर आधारित आहे, सामाजिक मानसशास्त्रातील एक फ्रेमवर्क जे असे दर्शवते की भविष्यातील अवांछित मन वळवण्याच्या प्रयत्नांविरुद्ध “प्रीबंकिंग” (किंवा प्री-एम्प्टिव्ह डिबंकिंग) द्वारे मानसिक प्रतिकार निर्माण करणे शक्य आहे. हे कसे कार्य करते याबद्दल अधिक जाणून घेण्यासाठी, कृपया या लिंकवर क्लिक करा.
या प्रकल्पाचा एक भाग म्हणून, आम्ही शैक्षणिक प्रीबंकिंग व्हिडिओंची मालिका तयार केली आहे, मन वळवण्याचे तंत्र किंवा सामान्यत: ऑनलाइन आढळणारा तार्किक खोटेपणा, जसे की भावनिक-प्रभारित भाषा वापरणे, स्पूफिंग किंवा परिपूर्ण समाधान मिळण्याचा भ्रम प्रत्येक विशिष्ट गोष्टीचे स्पष्टीकरण देते. कृपया व्हिडिओ पाहण्यासाठी या लिंकवर क्लिक करा.
हे व्हिडिओ संभाव्यतः नकारात्मक प्रेरणा देणारे कंटेंट ओळखण्याची लोकांची क्षमता सुधारतात की नाही हे तपासण्यासाठी, आम्ही प्रयोगशाळेच्या सेटिंगमध्ये यादृच्छिक नियंत्रित अभ्यासांची मालिका चालवली होती. ह्याचे परिणाम खूप सकारात्मक होते: कंट्रोल ग्रुपच्या तुलनेत, शैक्षणिक प्रीबंकिंग व्हिडिओ पाहणारे अभ्यासक सहभागी मनाला न-पटणारे सोशल मीडिया कंटेंट पेक्षा प्रेरणा देणारे सोशल मीडिया कंटेंट समजून घेण्यात लक्षणीयरित्या चांगले बनले. सोशल मीडियावरील माहितीच्या गुणवत्तेचे मूल्यांकन करण्याच्या त्यांच्या क्षमतेवर त्यांचा अधिक विश्वास होता, विश्वासार्ह कंटेंट ओळखण्याची त्यांची क्षमता सुधारली आणि इतरांसोबत नकारात्मकरित्या प्रेरक कंटेंट शेअर करण्याकडे कमी कल असल्याचे लक्षात आले. या अभ्यासाचे परिणाम सायन्स अॅडव्हान्सेसमध्ये प्रकाशित झाले आहेत.
या विशिष्ट अभ्यासासाठी, आपण व्हिडिओ ऑनलाइन जाहिराती म्हणून प्ले केल्यास लोकांची फेरफार करणारे सोशल मीडिया कंटेंट ओळखण्याची क्षमता सुधारण्यासाठी प्रभावी आहेत की नाही हे शोधण्यात आम्हाला स्वारस्य होते. हे करण्यासाठी, आम्ही खालील निकष पूर्ण केलेल्या ऑनलाइन भारतीय इंटरनेट वापरकर्त्यांच्या यादृच्छिक नमुन्यासाठी हे पाच व्हिडिओ दाखवण्यासाठी जाहिराती खरेदी केल्या: 1) 18 वर्षे किंवा त्याहून अधिक; 2) भारतीय रहिवासी; 3) हिंदी/मराठी/तेलुगु भाषिक. या नमुन्यात, लोकांना यादृच्छिकपणे प्रीबंकिंग व्हिडिओंपैकी एक जाहिरात म्हणून दाखवण्यात आले. एकतर व्हिडिओ दाखविलेल्या लोकांच्या यादृच्छिक उपसमूहांना नंतर एकच सर्वेक्षण प्रश्न दर्शविला गेला जेथे त्यांना काल्पनिक सोशल मीडिया पोस्टमध्ये कोणते मन वळवण्याचे तंत्र वापरले जात आहे हे ओळखण्यास सांगितले गेले. एकूण, आम्ही अशा 6 सोशल मीडिया पोस्ट्स तयार केल्या आहेत ज्यातून आम्ही सर्व सोर्सेस आणि इतर ओळखण्यायोग्य माहिती काढून टाकली आहे. यापैकी निम्म्या पोस्ट्स (3) मन वळवण्यासारख्या होत्या, तर बाकीच्या अर्ध्या प्रत्येक प्रेरक पोस्टच्या न्युट्रल (नॉन-प्रेझ्युएव्ह) जोड्या होत्या. आपण खाली एक प्रेरक पोस्ट आणि त्याच्या न्युट्रल जोडीचे उदाहरण पाहू शकता.
क्रिकेट सुपरस्टार म्हणतो की 25 वर्षांखालील तरुण मुले आता जलद अर्ज करू शकतात आणि काही आठवड्यांतच संघासाठी त्यांची निवड होऊ शकते!
भारत आणि ऑस्ट्रेलिया यांच्यात गुरुवारपासून जागतिक कसोटी चॅम्पियनशिपसाठी स्पर्धा होणार आहे.
तुम्ही पाहू शकता की, दोन्ही पोस्ट क्रिकेटशी संबंधित आहेत. तथापि, प्रेरक पोस्टमध्ये (शीर्षस्थानी) “क्रिकेट सुपरस्टार” सारखे शब्द आहेत जे एक प्रकारची ओळख-नक्कल करणारे वाक्यांश आहे जे संशोधन दाखवते की ऑनलाइन कंटेंटची व्हायरल क्षमता वाढू शकते. उजवीकडील पोस्टची शब्दरचना अधिक न्युट्रल आहे आणि कोणाचीही तोतयागिरी करणारी भाषा वापरली गेली नाही. एकूण, 3 अशा मॅनिपुलेशन-न्यूट्रल जोड्या आम्ही बनवल्या.
या अभ्यासात, आम्ही या गृहीतकाची चाचणी घेत आहोत की ज्या सहभागींनी जाहिरातीच्या स्वरूपात प्रीबंकिंग व्हिडिओ पाहिला आहे ते सोशल मीडिया कंटेंटमध्ये विशिष्ट अनुनय तंत्राचा वापर योग्यरित्या ओळखण्यात नियंत्रण ग्रुपपेक्षा (भरतीच्या निकषांची पूर्तता करणारा आणि वेगळा व्हिडिओ पाहणारा वापरकर्त्यांचा एक यादृच्छिक गट) लक्षणीयरित्या चांगले आहेत. या गृहितकांची पुष्टी झाली आहे की नाही याबद्दल अधिक जाणून घेतल्यावर आम्ही हे पेज अपडेट करू.
वरील व्हिडिओंपैकी एक पाहिल्यानंतर तुम्ही सर्वेक्षण प्रश्नाचे उत्तर दिले असल्यास, तुमचा प्रतिसाद आमच्या अभ्यासात रेकॉर्ड केला जाईल आणि वापरला जाईल. तुमची गोपनीयता सुनिश्चित करण्यासाठी, आम्ही कोणतेही युजर नेम किंवा इतर वैयक्तिकरित्या ओळखण्यायोग्य माहिती रेकॉर्ड करत नाही. आम्हाला आमच्या वैज्ञानिक संशोधनाचा भाग म्हणून सर्वेक्षणातील प्रश्नांना अभ्यास सहभागींच्या प्रतिसादांमध्येच स्वारस्य आहे आणि म्हणून आम्ही कोणताही लोकसंख्याशास्त्रीय किंवा इतर डेटा गोळा करत नाही. कारण आम्ही कोणतीही ओळख माहिती रेकॉर्ड करत नाही (आणि म्हणून कोणत्याही वैयक्तिक प्रतिसादांशी जुळवू शकत नाही), दुर्दैवाने आम्ही आमच्या डेटासेटमधून कोणतेही प्रतिसाद रेकॉर्ड केल्यानंतर ते काढून टाकण्यासाठी विनंती केल्यावर आम्ही ते काढण्यात अक्षम आहोत. केंब्रिज युनिव्हर्सिटीच्या मानसशास्त्र संशोधन नीतिशास्त्र समितीने या अभ्यासाचा आढावा घेतला. जर तुम्हाला या अभ्यासाबद्दल काही प्रश्न किंवा चिंता असतील तर कृपया या अभ्यासाचे समन्वयक (कॉर्डीनेटर) डॉ जॉन रोसेनबीक (jjr51@cam.ac.uk) यांच्याशी संपर्क साधा.
హలో , మీడియా అక్షరాస్యతా చొరవకు (మీడియా లిటరసీ ఇనీషియేటివ్) సుస్వాగతం. మీరు ఈ పేజీ చూసినట్లయితే, ఆన్ లైన్ లో మీకు ప్రకటన చూపించబడిన తరువాత మీరు ఇక్కడ లింక్ పై క్లిక్ చేసిన తరువాత ఇక్కడకు రీడైరక్ట్ చేయబడతారు. మీరు చూసిన ప్రకటన ఉద్దేశం గురించి మరియు దాని వెనక గల శాస్త్రీయమైన పరిశోధన గురించి మీరు ఈ పేజీలో ఎక్కువ తెలుసుకుంటారు.
మీడియా లిటరసీ ఎడ్యుకేషన్ అనేది కేంబ్రిడ్జ్ యూనివర్శిటీకి పరిశోధనా భాగస్వామి మైతోస్ ల్యాబ్స్ అందించే ఒక ప్రాజెక్ట్. ఆల్ఫ్రెడ్ ల్యాన్ డెకర్ ఫౌండేషన్, గూగుల్ జిగ్ సా, మరియు ఒమిడ్యార్ నెట్ వర్క్ ఇండియాలు ద్వారా ఇది మద్దతు చేయబడుతోంది. ఆన్ లైన్ లో సాధారణంగా వినియోగించబడే నచ్చచెప్పే టెక్నిక్కులను గుర్తించడానికి ప్రజల సామర్థ్యాన్ని మెరుగుపరచడం సాధ్యం అవునో కాదో తెలుసుకోవడానికి మేము ప్రయత్నిస్తున్నాం. “ప్రీబంకింగ్ “( లేదా ముందస్తుగా అవాస్తవాన్ని వెల్లడి చేయడం ) ద్వారా భవిష్యత్తులో అనవసరమైన రాజీ ప్రయత్నాలకు మానసికమైన వ్యతిరేకతను రూపొందించడం సాధ్యం చేయడాన్ని సమర్పించే సామాజిక మానసిక శాస్త్రం నుండి వచ్చిన మద్దతు వ్యవస్థ- ఇనోక్యులేషన్ సిద్ధాంతంలో ఈ ఆలోచన ఉంది. ఇది ఏ విధంగా పని చేస్తుందో మరింతగా తెలుసుకోవడానికి, దయచేసి ఈ లింక్ పై క్లిక్ చేయండి.
ఈ ప్రాజెక్ట్ లో భాగంగా, మేము విద్యాపరమైన ప్రీబంకింగ్ వీడియోస్ క్రమం తయారు చేస్తున్నాం, ఆన్ లైన్ లో సాధారణంగా ఎదుర్కోబడే నిర్దిష్టమైన రాజీ టెక్నిక్ లేదా తార్కికకంగా తప్పు వాదనను ప్రతి వీడియో వివరిస్తుంది. అనగా ఉద్వేగభరితమైన భాషను వినియోగించడం, మోసపూరితమైన అనుకరణ లేదా పరిపూర్ణమైన పరిష్కారపు తప్పు వాదనను వినియోగించడటం. వీడియోలు చూడటానికి దయచేసి ఈ లింక్ పై క్లిక్ చేయండి.
సంభావ్య వ్యతిరేక రాజీ కంటెంట్ ను గుర్తించడానికి ఈ వీడియోలు నిజంగా ప్రజల సామర్థ్యాన్ని మెరుగుపరుస్తున్నాయో లేదో పరీక్షించడానికి, ప్రయోగశాల ఏర్పాటులో యాదృచ్ఛికంగా నియంత్రించబడిన అధ్యయనాల క్రమాన్ని మేము నిర్వహించాము. ఫలితాలు చాలా అనుకూలంగా వచ్చాయి : నియంత్రణ గ్రూప్ తో పోల్చినప్పుడు, విద్యాపరమైన ప్రీబంకింగ్ వీడియోను చూసిన అధ్యయన పార్టిసిపెంట్స్ రాజీలేని సామాజిక మీడియా కంటెంట్ కంటే ఒప్పించే వివేచన గల సామాజిక మీడియాకు గణనీయంగా మెరుగ్గా మారారు. సామాజిక మాధ్యమంలో సమాచారం నాణ్యతను అంచనా వేయడానికి తమ సామర్థ్యంలో మరింత ఆత్మవిశ్వాసం కలిగి ఉన్నారు, విశ్వాసనీయమైన కంటెంట్ ను గుర్తించే తమ సామర్థ్యం మెరుగుపడింది మరియు ఇతరులతో వ్యతిరేకంగా ఒప్పించే కంటెంట్ ను ఇతరులతో పంచుకోవడానికి ఎక్కువ ఇష్టపడలేదు. ఈ అధ్యయనం ఫలితాలు సైన్స్ అడ్వాన్సెస్ లో ప్రచురించబడ్డాయి.
ఈ నిర్దిష్టమైన అధ్యయనం కోసం, ఆన్ లైన్ లో ఒక ప్రకటనగా మీరు వాటిని ఉపయోగించినప్పుడు తప్పుదోవ పట్టించే సోషల్ మీడియా కంటెంట్ ను గుర్తించే ప్రజల సామర్థ్యాన్ని మెరుగుపరచడంలో వీడియోలు ప్రభావవంతమైనవి అవునో కాదో కనుగొనడానికి మేము ఆసక్తి చూపించాము. ఇది చేయడానికి, ఈ క్రింది ప్రమాణాలు కలిగిన భారతదేశపు ఇంటర్నెట్ యూజర్స్ యొక్క యాదృచ్ఛిక నమూనాకు ఈ ఐదు వీడియోలను చూపించడానికి మేము ప్రకటనలను కొనుగోలు చేసాము : 1) 18 ఏళ్లు లేదా అంతకంటే ఎక్కువ వయస్సు గల వారు; 2) భారతదేశపు నివాసి; 3) హిందీ/మరాఠీ/తెలుగు –మాట్లాడేవారు. ఈ శ్యాంపిల్ లో, ఒక ప్రకటనగా ప్రీబంకింగ్ వీడియోస్ లో ఒకటి ప్రజలకు యాదృచ్ఛికంగా చూపించబడింది. వీడియో చూపించబడిన వ్యక్తుల యొక్క యాదృచ్ఛికమైన ఉప సమితి తరువాత ఒకే సర్వే ప్రశ్న చూపించబడింది: కల్పితమైన సోషల్ మీడియా పోస్ట్ లో నచ్చచెప్పే ఏ టెక్నిక్ వినియోగించబడిందో గుర్తించవలసిందిగా వారిని అడిగారు. మొత్తం, మేము అలాంటి 6 సోషల్ మీడియా పోస్ట్ తయారు చేసాము. మేము వాటిలో నుండి మూలాధారం మరియు గుర్తించబడే ఇతర సమాచారం తొలగించాము. ఈ పోస్ట్స్ లో (3) సగం నచ్చచెప్పేవిగా లేదా ఒప్పించేవిగా ఉండగా, తక్కిన సగం ప్రతి ఒప్పించే లేదా నచ్చచెప్పే పోస్ట్ యొక్క తటస్థ (ఒప్పించలేని) జతగా ఉన్నాయి. మీరు ఒప్పించే పోస్ట్ యొక్క ఉదాహరణ మరియు దాని తటస్థ జతను ఈ క్రింద చూడవచ్చు.
25 ఏళ్ల లోపు యవకులు ఇప్పుడు దరఖాస్తులను ఫాస్ట్ –ట్రాక్ చేయవచ్చు మరియు కొన్ని వారాలు లోగా టీమ్ కోసం ఎంపిక కావచ్చని క్రికెట్ సూపర్ స్టార్ అన్నారు!
భారత్ మరియు ఆస్ట్రేలియాలు ప్రపంచ టెస్ట్ ఛాంపియన్ షిప్ కోసం గురువారం నుండి తలపడనున్నాయి
మీరు చూసిన రెండు పోస్ట్స్ క్రికెట్ కు సంబంధించినవి. అయితే, ఒప్పించే పోస్ట్ ( పైన ఉన్నది) లో “క్రికెట్ సూపర్ స్టార్ “ అనే పదాలు ఉన్నాయి, ఇది ఒక రకమైన గుర్తింపును –అనుకరించే పదజాలం, ఇది ఆన్ లైన్ కంటెంట్ వైరల్ గా మారే సంభావ్యతను పెంచుతుందని పరిశోధన చూపిస్తోంది. కుడి వైపు ఉన్న పోస్ట్ లో పదాలు తటస్థంగా ఉన్నాయి మరియు ఇది ఎవరి గుర్తింపను అనుకరించే భాషను ఉపయోగించ లేదు. మొత్తంగా మేము అలాంటి 3 తప్పుదోవ పట్టించే- తటస్థ జతలను తయారు చేసాము.
ఈ అధ్యయనంలో, సోషల్ మీడియా కంటెంట్ లో ఒక ప్రత్యేకమైన ఒప్పించే టెక్నిక్ వినియోగాన్ని సరిగ్గా గుర్తించడంలో నియంత్రణ సమూహం కంటే ఒక ప్రకటనగా ప్రీబంకింగ్ వీడియోను చూసిన పార్టిసిపెంట్స్ (నియామకపు ప్రమాణాలకు అనుగుణంగా ఉండి మరియు వేరొక వీడియో చూసిన యాదృచ్ఛిక వినియోగదారుల సమూహం) మెరుగ్గా ఉన్నారని సిద్ధాంతాన్ని మేము పరీక్షిస్తున్నాము.
పైన చెప్పిన వీడియోలలో ఒక దానిని మీరు చూసిన తరువాత మీరు సర్వే ప్రశ్నకు జవాబు చెబితే, మీ జవాబు నమోదు చేయబడుతుంది మరియు మా అధ్యయనంలో వినియోగించబడుతుంది. మీ గోప్యతను నిర్థారించడానికి, మేము ఎటువంటి యూజర్ నేమ్స్ లేదా వ్యక్తిగతంగా గుర్తించబడే సమాచారం నమోదు చేయము . మా శాస్త్రీయమైన పరిశోధనలో భాగంగా సర్వే ప్రశ్నలకు అధ్యయన పార్టిసిపెంట్స్ యొక్క జవాబులలో మేము ఆసక్తి కలిగి ఉన్నాము కాబట్టి మేము ఎటువంటి జనాభా వివరాలు లేదా ఇతర డేటా సేకరించము. మేము ఎటువంటి గుర్తించబడే సమాచారాన్ని నమోదు చేయము కాబట్టి ( మరియు కాబట్టి ఎటువంటి స్వతంత్ర వ్యక్తుల జవాబులతో జత చేయబడవు) జవాబులను రికార్డ్ చేసిన తరువాత అభ్యర్థన మేరకు మేము మా డేటా సెట్ నుండి దురదృష్టవశాత్తు, మేము తొలగించలేము. ఈ అధ్యయనాన్ని కేంబ్రిడ్జ్ యూనివర్శిటీ సైకాలజీ రీసెర్చ్ ఎథిక్స్ కమిటీ సమీక్షించింది. ఈ అధ్యయనం గురించి మీకు ఏవైనా సందేహాలు లేదా విచారాలు ఉంటే ఈ అధ్యయనం యొక్క కోఆర్డినేటర్ డాక్టర్ జాన్ రూజెన్ బీక్ ను దయచేసి సంప్రదించండి (jjr51@cam.ac.uk).